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Wednesday, February 22, 2017

जिस दिन आप जाग गये उस दिन..

जिस दिन आप जाग गए उस दिन...

मनुष्य के अंदर काम, क्रोध, लोभ, स्वार्थ आदि के जो वेग हैं, उन वेगों का प्रभाव कहीं न कहीं अवश्य व्यक्त होता है। हमारी आंखें ऐसी हैं कि उनके द्वारा हमें तुरंत ज्ञात हो जाता है कि अगले आदमी के मन में क्रोध है, द्वेष है या राग है। साधना जितनी ऊंची होगी, उसका भाव उतना ही स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ जाएगा। जब आम पूरी तरह से पक जाता है तो उसका रंग, रूप और उसकी सुगंध अलग होती है, लेकिन कच्चे आम में यह सब नहीं होता। आदमी इसलिए आम सूंघ कर देखता है कि यह पका है या कच्चा। इसलिए परिपक्वता जिसके जीवन में आ जाएगी, उसके ऊपर का वातावरण, ऊपर का व्यवहार, रहन-सहन भी अत्यंत शांत होंगे।

डॉ. एस. डब्ल्यू. मिशेल कहते हैं कि शरीर नहीं, बल्कि हमारा मन बीमार होता है इसलिए शरीर को नहीं, मन को नकारात्मक और बीमार विचारों के संक्रमण से बचाना रोग से बचने या स्वस्थ रहने का पहला कदम है।’ मनुष्य में विचार ही एक ऐसी शक्ति है, जिससे वह अपना उद्धार कर सकता है। हमारे जीवन में हर समय कुछ न कुछ अंतर आता रहता है। बाहर का रूप कुछ और रहता है तथा भीतर का कुछ और। जो सच्चा साधक होता है, वह चाहे अकेला हो या लोगों के बीच हो, उसके भाव सदैव सकारात्मक रहते हैं।

अगर हमें बुरे सपने आते हैं तो यह हमारी नकारात्मक ऊर्जा है। अगर हम सकारात्मक होंगे तो स्वप्न में भी बुरे भाव नहीं आएंगे। आज का मनोविज्ञान तो यह कहता है कि स्वप्न में ही इंसान के अंतर भावों का दिग्दर्शन होता है। जैसा हमारा अंदर का रूप होगा, वही सपने में आएगा।

जिस समय सीताजी की अग्नि परीक्षा हुई, उस समय उन्होंने कहा, ‘मैंने सोते और जागते राम के सिवाय किसी दूसरे पुरुष की कामना की हो, तो अग्नि मुझे भस्म कर दे।’जब जागते हुए हम जागना सीखें तभी हम सोते हुए भी जाग सकते हैं। जागते हुए जागने का अर्थ है जीवन में पवित्रता एवं नैतिकता।

कहा भी है कि, जो ज्ञानी जाग गए, उनको संसार प्रत्यक्ष स्वप्न के समान मालूम होता है। हमें संसार स्वप्न कहां दिख रहा है? सब बातें सही मालूम पड़ रही हैं। यह हमारे बाल-बच्चे हैं, यह हमारे भाई हैं। जिस दिन हमारी नींद खुल जाएगी, हम सही रूप में जाग जाएंगे, तभी सच्चा भान होगा, तभी अद्भुत आनंद की प्राप्ति होगी।

कहने का मतलब यह है कि हमें अपने आप में आना है, अपने आपको जगाना है। उपनिषद में कहा गया है, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’ अर्थात- उठो, जागो और ज्ञानी जनों के पास जाकर उनसे ज्ञान प्राप्त करो। संसार एक स्वप्न के समान ही तो है। जब जागृति आ जाएगी तो फिर क्रोध, मान, माया, मोह सहज ही नष्ट हो जाएंगे।

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