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Wednesday, February 22, 2017

उदारता अपनाई ही जाय



सभ्यता, अनुशासन के परिपालन में है। अपने को नीतिमत्ता से अनुबन्धित किये रहें और दूसरों के साथ उदार व्यवहार बरतें, यही है मानवी गरिमा के साथ जुड़ा हुआ शालीन शिष्टाचार। इसके अन्तर्गत यह लोकाचार भी आता है कि घर में बालकों, वृद्धों असमर्थों की व्यवस्था पहले बनाई जाये, इसके उपरान्त अपनी ललक लिप्सा को आगे बढ़ने दिया जाये।    

जिन्हें अपना ही पेट सब कुछ दीखता है, वे उदारता बरतना तो दूर, बुरे लोगों की तरह निष्ठुरता बरतने में भी नहीं चूकते। ऐसों को दूसरों का अधिकार हरण करते हुये लज्जा, संकोच, भय जैसा भी कुछ अनुभव नहीं होता। ऐसी जड़ता अपनाने पर तो, किसी को मानवी गरिमा के क्षेत्र में भी प्रवेश करने का अवसर कभी नहीं मिलता।    

इन दिनों दैत्य की तूती हर क्षेत्र में बोलती हैं। हर किसी को खाने की ही नहीं, कुरतने-बर्बाद करने की भी सनक चढ़ी है। साधनों की आपाधापी में, पौराणिक सुन्द-उपसुन्द की तरह पारस्परिक मारकाट मची है। यदि गर्हित दृष्टिकोण बदला जा सका होता और पिछड़ों को प्रमुखता देते हुये उनका हक उन्हें स्वेच्छापूर्वक लौटा दिया गया होता, तो अपनी इसी दुनियाँ में कितनी प्रसन्नता और सुसम्पन्नता बिखरी पड़ी होती?

आत्मानुशासन रखा गया होता, संयम बरता जाता और अनिवार्य आवश्यकताएँ पूरी करके काम चला लिया जाता, तो इसका प्रभाव सार्वजनीन होता। मनुष्य सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन में अपनी बचत को, विभूतियों को नियोजित करने के निर्णय पर पहुँचता और ऐसे सृजन में, जिसे सतयुगी या स्वर्गीय कहने में किसी को कोई आपत्ति न होती। 

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