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Saturday, December 24, 2016

अपनी अपनी सोच

दोस्तों जैसा कि हम जानते है कि हर इंसान के सोचने का दायरा होता है सबकी सोच एक जैसी नही  होती है हर इंसान अलग सोच रखता है और इसी आधार पर जिंदगी में सफलताएं हासिल करता है अगर आप 10 अलग अलग लोगों से पूछेंगे कि जिंदगी में आप अधिक से अधिक क्या करना चाहते हैं ? कोई कहेगा अच्छा घर गाड़ी और अच्छा बिजनेस मिल जाये,  कोई कहेगा बस रहने खाने का जुगाड़ हो जाये, किसी का जवाब होगा मै इंजीनियर, डॉक्टर  बन जाऊँ तो कोई कहेगा स्पोर्ट्स मैन फिल्मस्टार बन जाऊँ किसी का जवाब होगा मै दुनिया का हर एक कोना देखना चाहता हूँ, तो कोई कहेगा मै समाज सेवा करना चहता हूँ और कोई बोलेगा अगर शादी हो जाये तो जिंदगी सफल हो जाये. दोस्तों असल में हमारी सफलता और असफलता हमारी सोच पर निर्भर करती  है!
अगर कोई फिल्म स्टार बना है तो अपनी सोच के वजह से कोई क्रिकेटर बना है तो अपनी सोच के वजह से अमेरिका अगर विश्व शक्ति बना है तो अपनी सोच के वजह से  आदमी जैसा सोचता है वैसा बन जाता है तो क्यों ना हम अच्छा सोचे हमारी सोच का दायरा बड़ा होना चहिये भारत में ज्यादातर लोग अशिक्षित और छोटी सोच रखने वाले हैं जिसके  कारण  अभी तक हम विश्व शक्ति नही बन पाये अपनी सोच का दायरा कभी छोटा ना रखें,
 बड़ा सोचे बड़ा बने और अपने साथ साथ देश को भी आगे लें जायें
जय हिंद..
आपका दोस्त
सौरभ कुमार सोनी 

Wednesday, December 14, 2016

सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र

सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें ★ गम्भीर रहना वैसे सामान्यतया बुरा माना जाता है और समझा जाता है कि हंसना-हंसाना, हल्के-फुल्के रहना अच्छा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य को प्रसन्न चित्त रहना चाहिए किन्तु गम्भीर रहना भी एक कला है। यहां पर गम्भीरता से तात्पर्य जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने से है। प्राचीनकाल से ही जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने की नीति प्रचलित थी, इस चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शितापूर्ण कहा जा सकता है। ★ मनीषी, दार्शनिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोग हमेशा जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर रहे हैं। वर्तमान युग में लोग चिन्तित रहते हैं गम्भीर नहीं। चिन्तित रहना एक बात है और गम्भीर रहना दूसरी। ★ आधुनिक युग में लोग चिन्ता और तनाव से बचने के लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा नशाखोरी का सहारा लेते रहते हैं। ठाली बैठकर गपशप करना, हल्के-फुल्के तथा गन्दे मजाक करना, ठिठोली करना और उसी में समय काट देना ही एक उनका उद्देश्य होता है। ऐसे लोग अन्दर से चिन्तित तथा तनावग्रस्त होते हैं और बाहर से सस्ते मनोरंजन का आधार लेकर प्रसन्न रहते हैं।

Tuesday, December 13, 2016

प्रयत्न से जीवन की परेशानी दूर होती है

 पुराने समय की बात है किसी नगर में एक भोला नाम का व्यक्ति रहता था। भोला दिन भर खेतों में काम करता और खेत में उगाये अन्न से ही उसके परिवार का गुजारा चलता था। भोला ने बचपन से ही गरीबी का सामना किया था। उसके माता पिता बेहद ही गरीब थे। भोला अक्सर सोचता कि जीवन कितना कठिन है। एक समस्या खत्म नहीं होती तो दूसरी शुरू हो जाती है। पूरा जीवन इन समस्याओं को हल करने में ही निकलता जा रहा है। ऐसे ही एक दिन भोला एक साधु के पास पंहुचा, और उन्हें सारी परेशानी बताई– कि कैसे मैं अपनी जिंदगी की कठिनाइयों का सामना करूँ? एक परेशानी खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। साधु महाराज हंसकर बोले- तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हारी परेशानी का हल बताता हूँ, साधु भोला को लेकर एक नदी के किनारे पहुंचे और बोले– मैं नदी के दूसरी पार जाकर तुमको परेशानी का हल बताऊंगा। यह कहकर साधु नदी के किनारे खड़े हो गए। नदी के किनारे खड़े खड़े जब बहुत देर हो गयी, भोला बड़ा आश्चर्यचकित होकर बोला– महाराज हमें तो नदी पार करनी है तो हम इतनी देर से किनारे पर क्यों खड़े हैं। साधु महाराज– बेटा मैं इस नदी के पानी के सूखने का इंतजार कर रहा हूँ, जब ये सूख जायेगा फिर आराम से नदी पार कर लेंगे। भोला को साधु की बातें मूखर्तापूर्ण लगीं, वो बोला– महाराज नदी का पानी कैसे सूख सकता है आप कैसी मूखर्तापूर्ण बातें कर रहे हैं। साधु हंसकर बोले– बेटा यही तो मैं तुमको समझाना चाह रहा हूँ, ये जीवन एक नदी है और समस्या पानी की तरह हैं। जब तुमको पता है कि नदी का पानी नहीं सूखेगा, तो तुमको खुद प्रयास करके नदी को पार करना होगा। वैसे ही जीवन में समस्याएं तो चलती रहेंगी, तुमको अपने प्रयासों से इन परेशानियों से पार पाना है। अगर किनारे बैठ कर नदी का पानी सूखने का इंतजार करोगे तो जीवन भर कुछ नहीं पा सकोगे। पानी तो बहता रहेगा, समस्या तो आती रहेंगी लेकिन आपको नदी की धार को चीरते हुए आगे जाना होगा, हर समस्या को धराशायी करना होगा। तभी जीवन में आगे बढ़ सकोगे। भोला की समझ में सारी बातें आ चुकी थीं। उसी हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता है, हम हमेशा सोचते हैं कि ये परेशानी खत्म हो जाये तब जीवन सुखी होगा, कभी वो परेशानी सुलझ जाये तब जीवन सुखी होगा। लेकिन ये समस्या ही नदी का पानी है, नदी तो बहती रहेगी तुमको पार जाना है औऱ यह आप पर निर्भर करता है आप नदी कैसे पार करते है।

आलस का परिणाम

एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान करता था। गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था। सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था। अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये। आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है। ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है। वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता। यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है। उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना लीये। एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा– ‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ। जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी। पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा।’ शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी, समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा। फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा, उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है। उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा। उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा। दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा की अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान लेता आएगा। उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा। पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी, और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा। पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था। अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया। पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी। उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा।

Friday, November 18, 2016

मानवता के दुश्मन भारत का विकास नहीं देख सकते

मैसूर ( कर्नाटक)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि मानवता के दुश्मन भारत को विकसित होते नहीं देखना चाहते हैं। और ऐसे ही असामाजिक तत्वों ने पंजाब के पठानकोट में हमला किया जिसे हमारे सुरक्षा बलों ने नाकाम कर दिया। पीएम मोदी ने संत शिवरात्रि राजेंद्र स्वामी के शताब्दी वर्ष समारोह का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में कहा कि हमारे सुरक्षा बल आतंकवादियों को करारा जवाब देने में हर तरह से सक्षम हैं।
पीएम मोदी ने सुरक्षा कर्मियों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने आतंकवादियों के इरादों को खाक में मिला दिया। उन्होंने देशवासियों को विश्वास दिलाया कि देश दुश्मन के नापाक इरादों को खत्म करने की ताकत रखता है और कहा कि ऐसे मौकों पर देश को एकजुट होकर एक सुर में बोलना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि आतंकवादियों ने शनिवार तड़के पठानकोट वायु सेना अड्डे पर हमला किया। इस हमले में तीन सुरक्षा कर्मी शहीद हुए हैं। वायु सेना अड्डे में घुसे पांचों आतंकवादियों को मार गिराए जाने के साथ ही  वहां सुरक्षाबलों का अभियान समाप्त हो गया है।

बेरहमीं की इंतहा

अगर हम यह सोचते और मानते हैं कि धर्म, संप्रदाय या जाति के नाम पर विवाद सिर्फ हमारे देश में ही होता है, तो हम गलत है। मानवता को शर्मसार करने वाली यह घटना दो अक्टूबर की है।


उस दिन इस्राइल की पुलिस नें एक 13 साल के एक फिलिस्तीनी मासूम को ऐदा रिफ्यूजी कैंप में गोली मार दी। पुलिस के अनुसार पुलिस को शक था कि उस लड़के पास जानलेवा हथियार था। इस वजह से पुलिस ने नजदीकी रेंज से उसे गोली मार दी

चश्मदीदों के अनुसार वह लड़का उसी वक्त जमीन पर गिर गया। खून इतना बह गया कि उसने अपनी जान गंवा दी। सांसो के लिए तड़पतें और दर्द से करहाते हुए, वो बच्चा खुद को जरा भी न हिला सका। वहां खड़े यहूदियों ने उसकी मदद करना तो दूर, उसे गालियां देना शुरू कर दिया।



उस लड़के का नाम हसन मनास्रेह है। फिलिस्तीन के इस लड़के साथ यह हादसा. बेतलेहेम से दो किलोमीटर दूर, ऐदा कैंप में हुई। ऐसे विवादों में सिर्फ दो ही चीजों की हार होती है। पहली है इंसानियत और दूसरी है जिंदगी

बहरहाल, कमजोर जहनियत की ऐसी घटनाएं, इंसानियत को शर्मसार करती है। ऐसे विवादों से हमें संयम और शांति की जरूरत है। उम्माद है कि आने वाले कल में किसी की जान लेना इतना आसान तो नहीं होगा...

मानवता के हार की कहानी

लखनऊ : पूरी दुनिया में नबावों के शहर के नाम से जाना जाने वाला लखनऊ अब अपराधों की राजधानी बन चुका है। जिस तरह दिल्ली में तीन साल पहले हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसी तरह की कई घटनाओं ने लखनऊ की मानवता को शर्मसार किया है। पुलिस ने दरिंदों को गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे तो पहुंचाया लेकिन फिर भी राजधानी में बहू-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं ऐसी ही कुछ घटनाएं हम आप को बता रहे हैं जो निर्भया की याद दिलाती हैं।


केस नंबर एक: 27 जून 2009 को गोमतीनगर इलाके में एक कलयुगी पिता ने अपनी सौतली बेटी को हवश का शिकार बना डाला। पीडि़ता की नानी की शिकायत पर पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया।

केस नंबर दो: 12 जनवरी 2013 को इंडियन एयर लाइंस में सिक्योरिटी गार्ड ने नौकरी छोड़ने के बाद अपनी पत्नी को देह व्यापार के धंधे में धकेल दिया। इस हैवान ने दूसरों के साथ उसकी अश्लील वीडियो फिल्म बनायी और इसके बाद रिकार्डिंग का हवाला देकर जिस बेटी को गोद में लेकर खिलाया, लेकिन उसकी भी अस्मत को भी नीलाम करने पर अमादा हो गया, लेकिन खुद को नीलाम कर चुकी मां अपनी लाडली की अस्मत बचाने के आगे आई और विकासनगर थाने में शिकायत तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया।

केस नंबर तीन: 2 फरवरी 2013 को माल थाना क्षेत्र में एक सौतले पिता ने अपनी 16 वर्षीय बेटी को ढाई माह तक बंधक बनाकर उसकी आबरू लूटी। दरिंदे पिता के चंगुल से किसी तरह मासूम बचकर बाहर निकली और माल थाने की दहलीज पर पहुंकर आप बीती बतायी। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस मुकदमा दर्ज कर आरोपी पिता को गिर तार कर सलाखों के पीछे भेजा।

केस नंबर चार:17 जुलाई 2014 को मोहनलालगंज के बलसिंह खेड़ा गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय परिसर में दरिंगी की हर हद पार कर दी गई थी। दरिंदों ने एक 30 वर्षीय महिला को निर्वस्त्र कर मौत की नींद सुलाया था।

केस नंबर पांच: 8 अगस्त 2014 को त्रिवेणीनगर निवासी एक बाप ने अपनी नाबालिग बेटी से रेप किया किशोरी एक प्राइवेट स्कूल में 9वीं की छात्रा थी। उसने अपने पिता पर सालों से रेप करने का आरोप लगाया था। हसनगंज कोतवाली प्रभारी दिनेश सिंह ने आरोपी के विरुद्ध रेप मुकदमा, और उसकी पत्नी पर 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया।

केस नंबर छह: 02 फरवरी 2015 को अमीनबाद के ग्रीन मार्केट निवासी इंटीरियर डेकारेशन का कारोबार करने वाले शिशिर श्रीवास्तव की 20 वर्षीय बेटी एलएलबी की छात्रा गौरी श्रीवास्तव की बेरहम कातिलों ने दो टुकड़े कर उसकी निर्मम हत्याकर लाश को पीजीआई थाना क्षेत्र स्थित वृन्दावन कॉलोनी के पास आवास विकास कार्यालय स्थित नहर के किनारे फेंक दिया था उसकी भी लाश दो टुकड़ो में बैग में मिली थी।

केस नंबर सात: 29 नवंबर 2015 को बंथरा थाना क्षेत्र निवासी एक सगे भाई ने अपनी बहन के साथ दुष्कर्म किया। इस घटना की जानकारी होते ही घर परिवार तो दूर यह घिनौनी वारदात स्थानीय लोगों को भी झकझोर कर रख दिया। फिलहाल यह तो बानगी भर आंकड़े हैं और भी वारदातें हुई जिनमें ज्यादातर अपने ही आरोपी निकले।

केस नंबर आठ: 4 दिसम्बर 2015 को मड़ियांव थानाक्षेत्र के आईआईएम रोड स्थित डेंटल कॉलेज के पास 4 कटे हुए पैर पड़े है जिन्हें कुत्ते नोच रहे है। घटना की जानकारी पाकर मौके पर थाना प्रभारी संतोष सिंह व क्षेत्राधिकारी प्रताप गोपेन्द्र पहुंचे और आशंका के मद्देनजर आस पास कॉम्बिंग शुरू की। कॉम्बिंग के दौरान पुलिस को घटनास्थल से लगभग 1 किमी दूरी पर सहारा सिटी होम के सामने सर्विस लेन पर एक बोरा दिखा जिसमे से अजीब दुर्गन्ध आ रही थी। पुलिस ने बोरा खुलवाकर देखा तो उसमे एक महिला का सर कटा धड़ था। वही इससे 300 मीटर की दूरी पर एक और सर कटा धड़ पड़ा हुआ था। घटना की जानकारी होते ही मौके पर एसएसपी लखनऊ राजेश पाण्डेय,डीआईजी डीके चौधरी, आईजी जकी अहमद व पुलिस अधीक्षक क्राइम ज्ञान प्रकाश चतुर्वेदी भी पहुंच गए लेकिन अभी तक शिनाख्त नहीं हो सकी।

केस नंबर नौ: बंथरा इलाके में 15 दिसम्बर को मजदूर श्रवण कुमार भुजवा (45) ने मासूम व उसके भाई को मिठाई खिलाने के बहाने घर के बुला लिया। श्रवण मासूम को मिठाई देने के बाद उसे निवस्त्र कर उसके साथ दुराचार का प्रयास करने लगा। चीख सुनकर दौड़े परिवारीजनों ने आपत्तिजनक हालत में आरोपि को धर दबोचा और उसकी जमकर पिटाई की। बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया। पीड़िता के पिता की तहरीर पर स्थानीय पुलिस ने आरोपित के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया। सूचना पाकर एसपी पूर्वी शिवराम व सीओ कृष्णानगर राजेश यादव पीड़िता के घर पहुंचे तथा उसके अभिभावकों को आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। एसओ संजय खरवार के मुताबिक आरोपी श्रवण की पत्नी ने उसे छोड़ दिया है और वह अकेले ही अपने घर में रहता है !

ख़त्म होती मानवीय संवेदना

मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति द्वारा पत्नी के शव को कंधे पर उठाकर हस्पताल से घर तक ले जाने की शर्मशार करने वाली घटना को कुछ ही दिन हुए है कि मध्य प्रदेश के ही शहडोल में एक दामाद को अपनी सास के शव को साइकिल पर २० किलोमीटर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा . सरकार और प्रशासन लाख दावे करे लेकिन गरीब व्यक्ति को सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलना मुश्किल ही है . यद्यपि इस बीस किलोमीटर के सफर में हज़ारों लोग मिले होंगे , गाड़ियां और कार वाले भी मिले होंगे . इतना ही नहीं मानवता को शर्मसार करने वाली एक घटना झारखंड के लातेहार में भी घटी जहाँ एक महिला को उसके घर से बीस किलोमीटर दूर सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म देना पड़ा . जबकि वहां से आने जाने वालों की संख्या कम नहीं थी . क्या इतना संवेदनहीन हो गए है हम . क्या हमारी मानवीयता समाप्त हो चुकी है . हम संज्ञा शून्य नहीं होते जा रहे है . आधुनिकता, व्यावसायिकता और स्वार्थ की अंधी दौड़ में हमारे अंदर से , हमारे परिवार और समाज से मानवीय संवेदनायें समाप्त होती जा रही है। अपने को प्रभावशाली और धनवान बनाने की चाहत में मशीनों और कम्प्यूटर पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और परिणाम स्वरुप दूसरों से आगे निकलने की चाहत में हम आत्मीयता से दूर होते हुए अपने मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे है। आज हम स्वयं मशीन हो गए है जिसमे कार्यक्षमता तो भरपूर है पर मानवीय संवेदना शून्य है। यही कारण है की बुलंदशहर में घटी अमानवीय घटना भी हमें तनिक भी विचलित नहीं करती और हम इसे मात्र एक समाचार की तरह जज्ब कर जाते है पर हमारे नेता अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने से नहीं चूकते . मानव जीवन का महत्वपूर्ण गुण है संवेदना, जिसके माध्यम से वो अपने परिवार , समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सफल होता है। जिस मनुष्य में जितनी अधिक संवेदना होती है , वो अपने परिवार और समाज से उतना ही जुड़ा होता है । एक संवेदनशील व्यक्ति के अंदर ही मानवता की भावना जागृत होती है। हमारे ऋषियों , मुनियों और महापुरुषों के अंदर मानवीय संवेदना ही थी जिसके बल पर उन्होंने समाज और राष्ट्र को नयी दिशा दी और उसका स्वरुप बदला है। संवेदना व्यक्ति को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यक्ति से परिवार , परिवार से समाज , समाज से राष्ट्र के हित के लिए कार्य करने को प्रेरित करती है। संवेदना मानवीय संबंधों का आधार है। पिछले दिनों मीडिया और सोशल साइट्स पर नाबालिग बच्चो द्वारा एक जानवर को जिन्दा जलाने की घटना मानवीय सम्वेदना समाप्त होने की प्रक्रिया की ओर ही इशारा करती है। गुजरात में दलितों को सरे आम कार से बांधकर दर्दनाक पिटाई करना , वृद्ध दंपति को मात्र 15 रुपयों के लिए कुल्हाड़ी से काट डालना, एक माँ द्वारा अपने निजी सुख में बाधक बनने वाले मासूम बच्चे को गला दबाकर मार डालना , अपने अहम् की संतुष्टि के लिए पति द्वारा पत्नी की बेरहमी से हत्या करना , मानवीय असंवेदनशीलता का ही धोतक है। लगभग रोज ही हम ऐसी अमानवीय घटनाओं से दो चार होते है . टी वी और समाचार पत्रों में संपत्ति और पैसों के लिए लोगों को अपने माँ और बाप के क़त्ल करने की घटनाये पढ़ते है और बहुत ही छोटा रिएक्शन देकर उसे भूल जाते है। लेकिन ये घटनाये हमारे बीच बढ़ते संवेदनहीन मानवीय प्रदूषण की ओर संकेत कर रही है। यदि मानव समाज से भावनाएं , सहानुभूति और संवेदना निकाल दी जाए तो हम में और जानवरों में फर्क ही क्या रह जायेगा। आप खुद विचार करें की सड़क पर दुर्घटना का शिकार हुए किसी शख्स की आप कितनी बार सहायता करते है ,जबकि हम ये जानते है की शायद हमारी थोड़ी सी सहायता उसकी जान बचा सकती है। जाने अनजाने रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे घरों में बुजुर्गो को हम कितना सम्मान देते है। बेबस और लाचार वृद्धों से हम कितनी सहानुभूति या अपनापन दिखा पाते है। आगे बढ़ने की चाहत में आज समाज में भाई - भाई , बहन- भाई , बाप - बेटे , पति - पत्नी के बीच खाइयां बढ़ती जा रही है. इतना ही नहीं पति पत्नी के बीच भी पैसे और पोजीशन को लेकर सामन्जस्य स्थापित नहीं हो पाता और आपसी लगाव और अपनेपन की कमी के कारण वे एक दूसरे के दुश्मन बन जाते है और परिवार बिखर जाता है। प्रगति के इस वातावरण में सामाजिक , आर्थिक और वैचारिक असमानता के कारण प्रत्येक व्यक्ति के मन में इर्ष्या और द्वेष की भावना ने जन्म ले लिया है , भाई हो या बहन या कोई अन्य सम्बन्धी , मित्र हो या पडोसी द्वेष और इर्ष्या के अनेक कारण हो सकते हैं ,जैसे रहन सहन या जीवन शैली में भारी अंतर ,पारिवारिक स्थिति में अंतर ,शिक्षा स्तर या पद में अंतर अर्थात इर्ष्या का कारण कोई भी,किसी भी प्रकार की आपसी तुलना हो सकती है. ये सभी स्थितियां सामाजिक प्रदूषण बढ़ा रही है. लेकिन ये स्थिति किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिये अच्छी नही है । 

इंसानियत पर सवाल उठाती मासूमों की तस्वीरें

मानवता को शर्मसार ! इंसानियत पर सवाल उठाती मासूमों की तस्वीरें

मानवता को शर्मसार ! इंसानियत पर सवाल उठाती मासूमों की तस्वीरें

कुछ तस्वीरें परिस्थितियों को समझाते हुए मानवीय संवेदना को पूरी तरह से झकझोर कर रख देती हैं और देखने वालों के अन्दर इस कदर कुलबुलाहट पैदा कर देतीं हैं कि वह एक न एक बार तो ज़रूर उस तस्वीर में छुपी भयावह स्थितियों को जानने की कोशिश करता है। अक्सर सोशल मीडिया पर देश-विदेश की ऐसी तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं जिसमे इंसानों द्वारा इंसानों पर बरपाया गया कहर, तस्वीरों से चीखती लहुलुहान आवाज़े सुनकर दिल से एक ही आवाज़ निकलती है कि आज इंसान किस हद तक सितमगर हो चुका है जो अपनी हठधर्मिता और अहंकार में बच्चों पर भी रहम नहीं करता।

इन दिनों ऐसी ही इंसानियत को शर्मसार करने वाली कुछ तस्वीरे सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं।

पहली तस्वीर-काफी दिनों पहले सोशल मीडिया पर चर्चित रही थी जिसके पीछे की कहानी के बारे में यह बताया गया कि फिलीस्तीन गाजा पट्टी पर किसी कैमरामैन ने बच्चे की तस्वीर उतारने के लिए कैमरा निकाला तो डरे,सहमें बच्चे ने सबसे पहले खुद-ब-खुद सरेंडर करते हुए अपने हाथ ऊपर कर लिए। फोटोग्राफर ने कोहराम के मंजर से डरे बच्चे की तस्वीर हू-ब-हू अपने कैमरे में उतार ली। जिसे बाद में सोशल मीडिया से लेकर तमाम देशों की मीडिया ने अपनी माध्यम की हेडलाइन बनाते हुए वहां चल रहे युद्द के भयावह मंजर को सबके सामने रखने की कोशिश की।

दूसरी तस्वीर-यह तस्वीर तो सच में इंसानी दिलों को ज्यादा भावुकता से भर देने वाली है। क्योंकि इसके पीछे की कहानी काफी दर्दनाक बतायी जा रही है। इसमें एक मासूम सीरियाई बच्चा जो अपनी माँ के साथ एक छोटी नाव में यूरोपीय देशों कि शरण को निकला था। इसे टर्की के समुद्र तट पर मृत पाया गया।

इस सुपुत्र की कहानी पढ़ कर आपका मानवता पे विश्वास लौट आएगा!

ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर ‘सुपुत्र’ को पढ़ना चाहिए.. जरुर पढ़िए और अपने मित्रों से साँझा कीजिये


पाश्चात्य विचारों के प्रभाव के कारण, आज के ज़माने में बहुत से लोग अपने  माँ-बाप को बोझ समझने लग जाते हैं।आये दिन हम दिल दहलाने वाली खबरे सुनते हैं, जिनसे लगता है की घोर कलयुग सचमुच आ गया है। लेकिन, यदि दुनिया अभी भी टिकी हुए है तो इसका कारण हैं वो लोग, जो आज भी सबके लिए मिसाल पेश करते हैं!


आज हम आपको एक ऐसे सुपुत्र की सच्ची कहानी सुनायंगे, जिसको पड़ने के बाद आपका मानवता पे विश्वास लौट आयेगा। यह कहानी है कैलाश गिरी ब्रह्मचारी की। उनकी अपनी 92 साल की अंधी माँ की तरफ श्रधा देख कर आपकी आँखें ज़रूर नम हो जाएँगी।

यह कहानी तब शुरू होती है, जब कैलाश बस बीस साल के थे। उनके माँ ने एक दिन यह इच्छा ज़ाहिर की, कि वह चार धाम की यात्रा पर जाना चाहती हैं। कैलाश ने एक दम हामी भरी, और अपने मन में यह दृढ निश्चय कर लिया, की वो अपनी माँ का येह सपना ज़रूर पूरा करेंगे। यह तब की बात है जब कैलाश बीस साल के थे। आज वो पचास साल के हो गए हैं। अब तक उन्होंने पैदल 36,000km की यात्रा पूरी कर ली है।



कैलाश ने बताया कि, जब वो आठ साल के थे, उनकी पेड़ से गिरने से हड्डी टूट गयी थी। तब माली हालत ख़राब होने के कारण उनका इलाज करवाना मुमकिन नहीं था। उनकी माँ ने परमात्मा से कैलाश को  जल्दी ठीक करने की प्राथना करी। उन्होंने यह मन्नत मांगी,की अगर कैलाश जल्द ठीक हो जाता है, तो वे भगवान्के घर शुक्रिया अदा करने ज़रूर जाएँगी। उनकी प्राथर्ना भगवान ने सुन ली, और जल्द ही कैलाश बिना दवाइयों के ठीक हो गए। पर उनकी माँ बिगड़ते हालातों के चलते अपना वादा नहीं निभा सकी ।

कैलाश को आज के ज़माने का श्रवण कुमार कहना गलत नहीं होगा।

कैलाश श्रवन कुमार की तरह अपनी माँ को एक टोकरी में बिठाकर कंधे पर ले कर चलते हैं। दूसरी टोकरी में वो ज़रुरत का सामान रखते हैं। रोजाना वेह 4 से 5 किलोमीटर चलते हैं। ये सुबह 6:30 बजे से चलना शुरू कर देते हैं। दोपहर को विश्राम करते हैं और शाम को माँ-बेटा किसी मंदिर में शरण ले लेते हैं।

जो लोग उन्हें खाना देते हैं, वो यह पहले अपनी माँ को खिलते हैं। उन्होंने अब तक कई नामचीन मंदिरों के दर्शन अपनी माँ को करवा दिये हैं। अब तक यह जगन्नाथ पूरी, तिरुपति, गंगा सागर, बासुकीनाथ धाम, तारापीठ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हृषिकेश, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, चित्रकूट, अल्लाहाबाद, नर्मदा, और पुष्कर, में दर्शन कर चुके हैं।



आज कल कैलाश अपनी माँ के साथ आगरा- मथुरा इलाके में हैं।

अब वो अपनी इस एतिहासिक यात्रा के आखरी चरण में हैं। कैलाश को पूरी आशा है, वो जल्द ही अपनी माँ की इच्छा पूरी कर पाएंगे । उन्हें बीस साल हो गए है, चलते हुए, कुछ और सही। इसके बाद वो अपने गाँव वार्गी, मध्या प्रदेश को लौटना चाहते हैं। आज भी उन्हें अपने इस बलिदान पर कोई गर्व नहीं हैं। वेह कहते हैं, की उनका माँ का उनके सिवा कोई नहीं हैं। उनके भाई और बहिन की पहले ही मौत हो गयी है। जब वेह दस साल के थे, तो उनके पिता का देहांत हो गया था ।

कैलाश जहाँ भी जाते हैं, लोग उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते। लोग उनका आशीर्वाद भी लेने आते हैं। पर वेह कहते हैं, की उनकी तुलना श्रवन कुमार से ना करें। वो सिर्फ यह चाहते हैं, की उनकी कहानी सुनकर और उन्हें देख कर शायद वो कुछ जवानों के दिल में माँ बाप के प्रति प्यार और इज्ज़त जगा सके।

हमारी शुभकामनाएं, कैलाश के साथ हैं ।

Thursday, November 17, 2016

मानवता की सही परिभाषा

एक डॉक्टर को जैसे ही एक अकस्मात् सर्जरी के बारे में फोन करके बताया गया. वो जितना जल्दी वहाँ आ सकते थे आ गए, वो तुरंत ही कपडे बदल कर ऑपरेशन थिएटर की और बढे. डॉक्टर को वहाँ उस लड़के के पिता दिखाई दिए, जिसका इलाज होना था. पिता डॉक्टर को देखते ही भड़क उठे और चिल्लाने लगे......

"आखिर इतनी देर तक कहाँ थे आप? क्या आपको पता नहीं है, की मेरे बच्चे की जिंदगी खतरे में है? क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? आप का कोई कर्तव्य है या नहीं ? ” डॉक्टर ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा- “मुझे माफ़ कीजिये, मैं हॉस्पिटल में नहीं था, मुझे जैसे ही पता लगा, जितनी जल्दी हो सका मैं आ गया. अब आप शांत हो जाइए, गुस्से से कुछ नहीं होगा”

ये सुनकर पिता का गुस्सा और चढ़ गया, भला अपने बेटे की इस नाजुक हालत में वो शांत कैसे रह सकते थे. उन्होंने कहा- “ऐसे समय में दूसरों को संयम रखने का कहना बहुत आसान है, आपको क्या पता की मेरे मन में क्या चल रहा है। अगर आपका बेटा इस तरह मर रहा होता तो क्या आप इतनी देर करते, यदि आपका बेटा मर जाए अभी, तो आप शांत रहेगे? कहिये ?” डॉक्टर ने स्थिति को भांपा और कहा- “किसी की मौत और जिंदगी ईश्वर के हाथ में है। हम केवल उसे बचाने का प्रयास कर सकते है। आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिये, और मैं अन्दर जाकर ऑपरेशन करता हूँ” ये कहकर डॉक्टर अंदर चले गए। करीब 3 घंटो तक ऑपरेशन चला। लड़के के पिता भी धीरज के साथ बाहर बैठे रहे। ऑपरेशन के बाद जैसे ही डाक्टर बाहर निकले, वे मुस्कुराते हुए, सीधे पिता के पास गए और उन्हें कहा- “ईश्वर का बहुत ही आशीर्वाद है, आपका बेटा अब ठीक है।

अब आपको जो भी सवाल पूछना हो पीछे आ रही नर्स से पूछ लीजियेगा, ये कहकर वो जल्दी में चले गए। उनके बेटे की जान बच गयी इसके लिए वो बहुत खुश तो हुए, पर जैसे ही नर्स उनके पास आई, वे बोले: “ये कैसे डॉक्टर है, इन्हें किस बात का गुरुर है, इनके पास हमारे लिए जरा भी समय नहीं है.” तब नर्स ने उन्हें बताया: कि ये वही डॉक्टर है जिसके बेटे के साथ आपके बेटे का एक्सीडेँट हो गया था, उस दुर्घटना में इनके बेटे की मृत्यु हो गयी, और जब उन्हें फोन किया गया, तो वे उसके क्रियाकर्म कर रहे थे और सब कुछ जानते हुए भी वो यहाँ आए और आपके बेटे का इलाज किया। नर्स की बाते सुनकर बाप की आँखो मेँ आँसू बहने लगे । मित्रो, ये होती है इन्सानियत और मानवता की सही परिभाषा ।।

Wednesday, November 16, 2016

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कृपया सोशल नेटवर्क पर इसे शेयर जरूर करें ताकि किसी गरीब के बच्चे के लिए यह जानकारी वरदान सिद्ध हो सके। अपना मानवता धर्म अवश्य निभाये क्योंकि शेयर करने का कोई पैसा नही लगता है साथ में आपके कर्मो में एक पूण्य कार्य जुड़ जाएगा।

बच्चो के दिल की सर्जरी निशुल्क कराने के लिए आप एसे गरीब बच्चों को तलाशकर आप भी पुण्य का लाभ लें| दिल में छेद है, तो ओपरेशन का खर्च लाखों रूपये होगा| गरीब कहाँ से लाये उनके बच्चे आपकी सहायता से अब जिंदगी पा सकते हें|

धर्मार्थ संस्थायें, मंदिर, मस्जिद ट्रस्ट, और धर्म प्रचारक खरबों रूपये का चंदा जनता से प्राप्त करते हें, और उस चंदे का कितना सदुपयोग जनता के लिए होता है| यह किसी से छुपा हुआ नही है| वहीँ इनके बीच कुछ एसी संस्थाएं हमारे धर्म और उनके आचार्यों सन्तों के प्रति आस्था बनाये रखने में मददगार होती हैं, यही है जिससे सामान्य जन का धर्माचार्यों पर विश्वास और अटूट बनता जाता है|
www.allayurvedic.org

 श्री सत्य साईं बाबा जिनकी मृत्य कुछ वर्ष पूर्व (जन्म: 23 नवम्बर 1926 ; मृत्यु: 24 अप्रैल 2011) हुई थी, बाबा ने आध्यात्मिक उपदेशों के साथ ही सामाजिक क्षेत्र में भी अनेक सेवा कार्य किये। जिनकी शुरुआत पुट्टपर्थी में एक छोटे से अस्पताल के निर्माण के साथ हुई, जो अब 220 बिस्तर वाले सुपर स्पेशलिटी सत्य साई इंस्टीट्यूट ऑफ हायर मेडिकल साइंसेस का रूप ले चुका है। जहाँ निशुल्क लाखो लोग अपने हार्ट का ओपरेशन करा चुके हें|

इसी कड़ी में बच्चो के ह्रदय के ओपरेशन हतु लिए छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े और गरीबो आदिवासियों के राज्य में हॉस्पिटल खोला है|

इस अस्पताल में जैसा की समाचार में बताया है कोई केश काउंटर नहीं अथात पूर्ण निशुल्क है|
केवल आपरेशन ही निशुल्क नहीं, रोगी और एक सहायक अटेंडेंट के भोजन आदि का व्यय भी फ्री है|
अस्पताल के पी आर ओ श्री अजय सराफ का कहना है की यह सब कुछ सेवा के लिए है| हम प्रत्येक को घर जैसा वातावरण देतें हैं| अभी प्रति दिन तीन आपरेशन लिए जा रहे हें|
अभी तक यहाँ पिछले तीन वर्षों में लगभग ७७६ ओपरेशन कर बालको को नया जीवन दान दिया जा चूका है| यहाँ अभी कोई वेटिंग लिस्ट नही है|

आपकी जानकारी में एसे गरीब बच्चे हों तो आप उन्हें यहाँ जाकर ओपरेशन करें के लिए प्रेरित करे| ताकि अमूल्य जीवन बचाया जा सके|
Free Registration Time

यहाँ प्रति सोमवार से शुक्रवार तक प्रात: 9 बजे से 3 बजे तक रोगियों का पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) होता है| मोब न. +91 9424207140 और फोन न- +91 771-2445800 पर संपर्क कर करवाया जा सकता है|

सत्य साईं संजीवनी हॉस्पिटल Raipur
Naya Raipur emerging as a major center for free treatment of heart patients

Shri Satya Sai Sanjeevani Hospital dedicated to serve humanity More than 3000 patients benefited

More than 300 free heart surgeries performed till date Caste-religion, nationality or financial status no bar for medical services and operations
One of its kind hospital with no billing counter


जहाँ कोई केश काउंटर नहीं-WHERE NO CASH COUNTER

श्री सत्य साईं संजीवनी अस्पताल मानवता की सेवा के लिए समर्पित, अभी तक 3000 से अधिक रोगियों को लाभान्वित, 300 से अधिक मुक्त हृदय की सर्जरी आज तक संपन्न| जाति-धर्म, चिकित्सा सेवाओं और कार्यों के लिए राष्ट्रीयता या वित्तीय स्थिति कोई बंधन नहीं|
www.allayurvedic.org
कोई बिलिंग काउंटर के साथ अपनी तरह अस्पताल में से एक छत्तीसगढ़ के नया रायपुर मुफ्त चिकित्सा उपचार और जन्मजात हृदय रोगियों की नि: शुल्क हार्ट सर्जरी के लिए देश के मानचित्र पर एक तेजी से उभरती केंद्र बन गया है। सामाजिक कल्याण संगठन जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, राज्य और वित्तीय स्थिति की सीमाओं से परे हृदय रोगियों को नि: शुल्क चिकित्सा उपचार और आपरेशन की सुविधा उपलब्ध कराने के द्वारा मानवता की सेवा है, नया रायपुर में स्थित है, सत्य साईं संजीवनी हॉस्पिटल नाम दिया है।
अस्पताल इन सभी सेवाओं और नि: शुल्क सुविधाएं प्रदान करता है के रूप में, यह अपने परिसर में कोई बिलिंग काउंटर है। अस्पताल के द्वारा मुफ्त भोजन और रोगियों के लिए आवास और उनके स्वजन में से एक को प्रदान करता है। 0-35 साल के आयु समूह के जन्मजात हृदय रोगियों की महत्वपूर्ण हार्ट सर्जरी की निशुल्क है|अस्पताल भी बच्चो को चिकित्सा हृदय शल्य चिकित्सा की सुविधा आवश्यक दवाएं सहित प्रदान करता है

दोस्तों इस खबर को जरूर शेयर करे जिससे गरीब बच्चों के स्वास्थ्य को फायदा मिल सके.बच्चो के दिल की सर्जरी निशुल्क कराने के लिए आप ऐसे गरीब बच्चों को तलाशकर आप भी पुण्य का काम  करे धन्यवाद.!!!

Wednesday, October 19, 2016

धर्म निरपेक्षता का नया आयाम

भारत – एक ऐसा देश जिसने कई चीज़ों के मायनों को नया आयाम दिया है। आधुनिक काल में “सेक्यूलर” शब्द को भी नया आयाम दे दिया गया है। इसका अर्थ अब धर्म निर्पेक्ष होना नहीं रहा वरन्‌ केवल एक खास धर्म की ओर ध्यान देना है। वर्ना क्या कारण है कि कभी किसी “सेक्यूलर” नेता द्वारा दीपावली/होली या लोहड़ी/बैसाखी या क्रिसमस/ईस्टर आदि की दावत नहीं दी जाती लेकिन इफ़्तार पार्टी देने की सभी में होड़ लगी हुई होती 
 क्या पिछली दुर्गा पूजा पर पार्टी दी थी? दीपावली पर? क्रिसमस भी निकल गया और अभी अप्रैल में ईस्टर भी निकल गया। मुझे तो ध्यान नहीं कि टैक्सपेयर्स (tax payers) के खर्चे पर कोई दावत हुई हो!
जब सिर्फ़ एक धर्म विशेष को ही अपीज़ (appease) करना उद्देश्य है तो मेरे ख्याल से सभी टैक्स आदि भी उसी धर्म विशेष के लोगों से लिए जाने चाहिए, क्यों बाकी लोगों के खून पसीने की गाढ़ी कमाई किसी एक तबके पर खर्च की जाए।
और यदि सरकारें आदि धर्मनिर्पेक्ष है तो उनको धर्मनिर्पेक्ष वास्तविक मायनों में रहना चाहिए। सरकारी खर्चे पर कोई धर्म संबन्धित कार्य नहीं होने चाहिए, चाहे पूजा-हवन आदि हो या दावत हो या फिर आरक्षण अथवा छात्रवृत्ति (scholarship) हो। सरकार सभी की होती है, किसी धर्म विशेष की नहीं, तो किसी धर्म विशेष पर अधिक ध्यान देना उचित नहीं।