मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति द्वारा पत्नी के शव को कंधे पर उठाकर हस्पताल से घर तक ले जाने की शर्मशार करने वाली घटना को कुछ ही दिन हुए है कि मध्य प्रदेश के ही शहडोल में एक दामाद को अपनी सास के शव को साइकिल पर २० किलोमीटर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा . सरकार और प्रशासन लाख दावे करे लेकिन गरीब व्यक्ति को सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलना मुश्किल ही है . यद्यपि इस बीस किलोमीटर के सफर में हज़ारों लोग मिले होंगे , गाड़ियां और कार वाले भी मिले होंगे . इतना ही नहीं मानवता को शर्मसार करने वाली एक घटना झारखंड के लातेहार में भी घटी जहाँ एक महिला को उसके घर से बीस किलोमीटर दूर सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म देना पड़ा . जबकि वहां से आने जाने वालों की संख्या कम नहीं थी . क्या इतना संवेदनहीन हो गए है हम . क्या हमारी मानवीयता समाप्त हो चुकी है . हम संज्ञा शून्य नहीं होते जा रहे है . आधुनिकता, व्यावसायिकता और स्वार्थ की अंधी दौड़ में हमारे अंदर से , हमारे परिवार और समाज से मानवीय संवेदनायें समाप्त होती जा रही है। अपने को प्रभावशाली और धनवान बनाने की चाहत में मशीनों और कम्प्यूटर पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और परिणाम स्वरुप दूसरों से आगे निकलने की चाहत में हम आत्मीयता से दूर होते हुए अपने मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे है। आज हम स्वयं मशीन हो गए है जिसमे कार्यक्षमता तो भरपूर है पर मानवीय संवेदना शून्य है। यही कारण है की बुलंदशहर में घटी अमानवीय घटना भी हमें तनिक भी विचलित नहीं करती और हम इसे मात्र एक समाचार की तरह जज्ब कर जाते है पर हमारे नेता अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने से नहीं चूकते . मानव जीवन का महत्वपूर्ण गुण है संवेदना, जिसके माध्यम से वो अपने परिवार , समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सफल होता है। जिस मनुष्य में जितनी अधिक संवेदना होती है , वो अपने परिवार और समाज से उतना ही जुड़ा होता है । एक संवेदनशील व्यक्ति के अंदर ही मानवता की भावना जागृत होती है। हमारे ऋषियों , मुनियों और महापुरुषों के अंदर मानवीय संवेदना ही थी जिसके बल पर उन्होंने समाज और राष्ट्र को नयी दिशा दी और उसका स्वरुप बदला है। संवेदना व्यक्ति को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यक्ति से परिवार , परिवार से समाज , समाज से राष्ट्र के हित के लिए कार्य करने को प्रेरित करती है। संवेदना मानवीय संबंधों का आधार है। पिछले दिनों मीडिया और सोशल साइट्स पर नाबालिग बच्चो द्वारा एक जानवर को जिन्दा जलाने की घटना मानवीय सम्वेदना समाप्त होने की प्रक्रिया की ओर ही इशारा करती है। गुजरात में दलितों को सरे आम कार से बांधकर दर्दनाक पिटाई करना , वृद्ध दंपति को मात्र 15 रुपयों के लिए कुल्हाड़ी से काट डालना, एक माँ द्वारा अपने निजी सुख में बाधक बनने वाले मासूम बच्चे को गला दबाकर मार डालना , अपने अहम् की संतुष्टि के लिए पति द्वारा पत्नी की बेरहमी से हत्या करना , मानवीय असंवेदनशीलता का ही धोतक है। लगभग रोज ही हम ऐसी अमानवीय घटनाओं से दो चार होते है . टी वी और समाचार पत्रों में संपत्ति और पैसों के लिए लोगों को अपने माँ और बाप के क़त्ल करने की घटनाये पढ़ते है और बहुत ही छोटा रिएक्शन देकर उसे भूल जाते है। लेकिन ये घटनाये हमारे बीच बढ़ते संवेदनहीन मानवीय प्रदूषण की ओर संकेत कर रही है। यदि मानव समाज से भावनाएं , सहानुभूति और संवेदना निकाल दी जाए तो हम में और जानवरों में फर्क ही क्या रह जायेगा। आप खुद विचार करें की सड़क पर दुर्घटना का शिकार हुए किसी शख्स की आप कितनी बार सहायता करते है ,जबकि हम ये जानते है की शायद हमारी थोड़ी सी सहायता उसकी जान बचा सकती है। जाने अनजाने रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे घरों में बुजुर्गो को हम कितना सम्मान देते है। बेबस और लाचार वृद्धों से हम कितनी सहानुभूति या अपनापन दिखा पाते है। आगे बढ़ने की चाहत में आज समाज में भाई - भाई , बहन- भाई , बाप - बेटे , पति - पत्नी के बीच खाइयां बढ़ती जा रही है. इतना ही नहीं पति पत्नी के बीच भी पैसे और पोजीशन को लेकर सामन्जस्य स्थापित नहीं हो पाता और आपसी लगाव और अपनेपन की कमी के कारण वे एक दूसरे के दुश्मन बन जाते है और परिवार बिखर जाता है। प्रगति के इस वातावरण में सामाजिक , आर्थिक और वैचारिक असमानता के कारण प्रत्येक व्यक्ति के मन में इर्ष्या और द्वेष की भावना ने जन्म ले लिया है , भाई हो या बहन या कोई अन्य सम्बन्धी , मित्र हो या पडोसी द्वेष और इर्ष्या के अनेक कारण हो सकते हैं ,जैसे रहन सहन या जीवन शैली में भारी अंतर ,पारिवारिक स्थिति में अंतर ,शिक्षा स्तर या पद में अंतर अर्थात इर्ष्या का कारण कोई भी,किसी भी प्रकार की आपसी तुलना हो सकती है. ये सभी स्थितियां सामाजिक प्रदूषण बढ़ा रही है. लेकिन ये स्थिति किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिये अच्छी नही है ।
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