ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर ‘सुपुत्र’ को पढ़ना चाहिए.. जरुर पढ़िए और अपने मित्रों से साँझा कीजिये
पाश्चात्य विचारों के प्रभाव के कारण, आज के ज़माने में बहुत से लोग अपने माँ-बाप को बोझ समझने लग जाते हैं।आये दिन हम दिल दहलाने वाली खबरे सुनते हैं, जिनसे लगता है की घोर कलयुग सचमुच आ गया है। लेकिन, यदि दुनिया अभी भी टिकी हुए है तो इसका कारण हैं वो लोग, जो आज भी सबके लिए मिसाल पेश करते हैं!
आज हम आपको एक ऐसे सुपुत्र की सच्ची कहानी सुनायंगे, जिसको पड़ने के बाद आपका मानवता पे विश्वास लौट आयेगा। यह कहानी है कैलाश गिरी ब्रह्मचारी की। उनकी अपनी 92 साल की अंधी माँ की तरफ श्रधा देख कर आपकी आँखें ज़रूर नम हो जाएँगी।
यह कहानी तब शुरू होती है, जब कैलाश बस बीस साल के थे। उनके माँ ने एक दिन यह इच्छा ज़ाहिर की, कि वह चार धाम की यात्रा पर जाना चाहती हैं। कैलाश ने एक दम हामी भरी, और अपने मन में यह दृढ निश्चय कर लिया, की वो अपनी माँ का येह सपना ज़रूर पूरा करेंगे। यह तब की बात है जब कैलाश बीस साल के थे। आज वो पचास साल के हो गए हैं। अब तक उन्होंने पैदल 36,000km की यात्रा पूरी कर ली है।
कैलाश ने बताया कि, जब वो आठ साल के थे, उनकी पेड़ से गिरने से हड्डी टूट गयी थी। तब माली हालत ख़राब होने के कारण उनका इलाज करवाना मुमकिन नहीं था। उनकी माँ ने परमात्मा से कैलाश को जल्दी ठीक करने की प्राथना करी। उन्होंने यह मन्नत मांगी,की अगर कैलाश जल्द ठीक हो जाता है, तो वे भगवान्के घर शुक्रिया अदा करने ज़रूर जाएँगी। उनकी प्राथर्ना भगवान ने सुन ली, और जल्द ही कैलाश बिना दवाइयों के ठीक हो गए। पर उनकी माँ बिगड़ते हालातों के चलते अपना वादा नहीं निभा सकी ।
कैलाश श्रवन कुमार की तरह अपनी माँ को एक टोकरी में बिठाकर कंधे पर ले कर चलते हैं। दूसरी टोकरी में वो ज़रुरत का सामान रखते हैं। रोजाना वेह 4 से 5 किलोमीटर चलते हैं। ये सुबह 6:30 बजे से चलना शुरू कर देते हैं। दोपहर को विश्राम करते हैं और शाम को माँ-बेटा किसी मंदिर में शरण ले लेते हैं।
जो लोग उन्हें खाना देते हैं, वो यह पहले अपनी माँ को खिलते हैं। उन्होंने अब तक कई नामचीन मंदिरों के दर्शन अपनी माँ को करवा दिये हैं। अब तक यह जगन्नाथ पूरी, तिरुपति, गंगा सागर, बासुकीनाथ धाम, तारापीठ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हृषिकेश, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, चित्रकूट, अल्लाहाबाद, नर्मदा, और पुष्कर, में दर्शन कर चुके हैं।
आज कल कैलाश अपनी माँ के साथ आगरा- मथुरा इलाके में हैं।
अब वो अपनी इस एतिहासिक यात्रा के आखरी चरण में हैं। कैलाश को पूरी आशा है, वो जल्द ही अपनी माँ की इच्छा पूरी कर पाएंगे । उन्हें बीस साल हो गए है, चलते हुए, कुछ और सही। इसके बाद वो अपने गाँव वार्गी, मध्या प्रदेश को लौटना चाहते हैं। आज भी उन्हें अपने इस बलिदान पर कोई गर्व नहीं हैं। वेह कहते हैं, की उनका माँ का उनके सिवा कोई नहीं हैं। उनके भाई और बहिन की पहले ही मौत हो गयी है। जब वेह दस साल के थे, तो उनके पिता का देहांत हो गया था ।
कैलाश जहाँ भी जाते हैं, लोग उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते। लोग उनका आशीर्वाद भी लेने आते हैं। पर वेह कहते हैं, की उनकी तुलना श्रवन कुमार से ना करें। वो सिर्फ यह चाहते हैं, की उनकी कहानी सुनकर और उन्हें देख कर शायद वो कुछ जवानों के दिल में माँ बाप के प्रति प्यार और इज्ज़त जगा सके।
हमारी शुभकामनाएं, कैलाश के साथ हैं ।


No comments:
Post a Comment